Thursday, September 20, 2018

अपना दृष्टिकोण सुधारें

मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण होता है, वह दुसरो के प्रति जैसा सोचता है, उसी के अनुसार उसके विचार होते है और इनके फलस्वरूप वैसा ही वातावरण व परिस्थितियाँ प्राप्त कर लेता है। दुसरों के दोष_दर्शन, नुक्ताचीनी करने वाले व्यक्ति जहाँ भी जाते हैं, उन्हें अच्छाई नजर ही नहीं आती और लोगों से उनकी नहीं बनती । सबको अच्छी निगाह से देखने पर सरल सात्विक स्वभाव के लोगों को सब जगह अच्छाई ही नजर आती है। बुराई में भी वह ऊँचे आदर्श का दर्शन करते हैं। वास्तव में जिस व्यक्ति के अपने भीतर बुराई रहा करती है, उसे सारा संसार बुरा दीख पड़ता है। मनुष्य अपने अच्छे बुरे दृष्टिकोण को बाह्य परिस्थितियों पर आरोपित करके वैसा ही देखता है। जैसा मनुष्य स्वयं होगा, वैसा ही बाहर देखेगा।
संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं, जिसे सब सुख हों, सारी परिस्थितियां मनोवांछित हों, कोई कष्ट न हो कभी असफलता न मिले। जहांँ अनेक
सुख साधन भगवान ने मनुष्य को दिए है, वहाँ कुछ थोड़े अभाव भी रखे है। विवेकशील व्यक्ति
जिवन में उपलब्ध सुख सुविधाओं का अधिक चिंतन
करते हैं और उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते
हुए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। इसके विपरीत अनेक लोग उपलब्ध अनेक सुख साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े से कष्ट है, अभाव है, उन्हें ही पर्वत तुल्य मानकर अपने आपको भारी विपत्ति ग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों की अधिकांश मानसिक शक्ति रोने झींकने में ही चली जाती है  जीवन को शांतिपूर्ण रीती से व्यतीत करने का तरीका यह है कि
जो अपनी कठिनाइयों को बढा चढाकर न आँके। उन्हे उतना ही समझें, जितनी वह वास्तव में है। इससे हमारी अनेक चिंताएँ आसानी से नष्ट हो सकती है। हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बढ़ा चढाकर न देखें, वरन उनको दुसरे आपत्ति ग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आपको अपेक्षाकृत कम दु:खी अनुभव करें। जहाँ हो सके जीवन के प्रति अपना नजरिया या द्रष्टिकोण सकारात्मक रखें।
सुखी जीवन की आकांक्षा सभी को होती है, पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने द्रष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने  का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ द्रष्टिकोण स्वल्प साधनों और परिस्थितियों में भी शांति और संतोष को कायम रख सकता है।

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